ग्लैमर में नौकरशाही और पत्रकारिता 

तीसरी क़िस्त—

ग्लैमर में नौकरशाही और पत्रकारिता

योगेन्द्र श्रीवास्तव
अमेठी 12 नवम्बर 2019 (शिखर सत्ता)।  पत्रकारिता का ग्लेमर  सरकारी और प्राइवेट नौकरशाही में दिखाई पड़ रहा कारण भी है पत्रकारिता से बढ़ता दबदबा या मानदेय के साथ दबाव व ब्लैकमेलिंग से विज्ञापन का दबाव बनाकर वसूली या कहे कि धन उपार्जन के एवज में खबरे प्रकाशित करना लोगो का शगल बन गया है। इसके लिए नौकरशाही में होने के बाद भी भैया और दीदी से चाटुकारिता कर रहे है उन लोगो ने केवल पत्रकारिता के पेशे से जुड़ लोगो को शर्मसार कर रहे है और अपने को ही पत्रकारिता के सही मापदण्डो को करने का तमगा लगा रहे है। ऐसे लोग ज्यादातर शिक्षा विभाग से जुड़े हुए है तो कुछ अन्य विभाग से भी। नौकरशाही और पत्रकारिता में ताल मेल न बना पाने वाले कुछ को तो नौकरी गवानी पड़ी तो कुछ को पत्रकारिता तो कुछ ने इसी से नौकरी हसिल कर रखी है।
नौकरशाही और पत्रकार जब दोनों एक दूसरे में इस तरह पिरोई हुए है जैसे दूध में पानी आज के वर्तमान परिवेश में सरकारी नौकरी हो या प्राइवेट नौकरी करने वालो को पत्रकारिता का चस्का लग गया है उन्हें नौकरी से ज्यादा पत्रकारिता से प्यार है क्यो की व्याकर उनकी ही सही है और तो विना व्याकरण के है खैर इस रास्ते को पूरा करने के लिए विज्ञापन से लेकर दलाली तक करने को मजबूर है। पत्रकारिता के संस्थान को चाहिए विज्ञापन और पत्रकारिता में एक स्थान से दूसरे स्थान भ्रमण करने के लिए चाहिए धन चाहिए नौकरी से कमाए हुए धन को ए पत्रकारिता में बर्बाद नही कर सकते। तो दो रास्ते बचते है समय निकाल कर साहब के पास पहुँच कर या उनके बनाए ग्रुप में खबर चापलूसी की पोस्ट कर पूरा करते है।  सरकारी या प्राइवेट नौकरी वाले इस लिए भी पत्रकारिता से जुड़े है की उनके राजनीतिक दल और संस्थान में उनका दबदबा बना रहे साथ ही विज्ञापन और दलाली से उनके खर्चे निकलते रहे। ऐसे पत्रकारों के खिलाफ  जिला प्रशासन और विजिलेंस टीम से जांच करा कर कार्यवाही करना चाहिए। लेकिन वह भी इस लिए नही करता कि उसकी भी वह वही जो ए करते रहते है।

अमेठी में ही नहीं पूरे प्रदेश के अंदर चाहे वह वेब पोर्टल का हो चाहे वो टीवी का हो या फिर प्रिंट मीडिया का हो दलाली का कार्य लगातार फल फूल रहा है इस पर कोई लगाम नहीं लगा है और आगे भविष्य में लग भी नहीं सकता है अगर एक सच्चा पत्रकार स्वच्छ रूप से अपनी कलम से लिखता भी है तो लोगों को सच हजम नहीं होता है चाहे वह आला अधिकारी हो या फिर या फिर प्रिंट मीडिया का पत्रकार हो उल्टा सच्चे पत्रकार को फसाने में तनिक भी कसर नहीं छोड़ता है और दलाली हर विभाग में अपनी चरम सीमा पर मौजूद है मैं किसी के साथ में इस टिप्पणी का गलत शब्द नहीं नही कहना चाहता हूं।

 लेकिन जब  फुल टाइम पत्रकारों की बात करे तो उनके सामने समस्या ही समस्या है आइए उनकी  क्या समस्या है इस पर भी बात हो जाए यह भी किसी से छुपी नही है वर्तमान के परिपेक्ष में इसका दूर तक इसका इलाज नहीं दिख रहा, वजह हमारे मीडिया प्रबंधन की अहम है, खबरें गांव गांव तक चाहिए,लेकिन कवरेज के लिए एक रुपए नही देंगें, आखिरकार संवाददाता का भी अपना परिवार भी तो होता है,पारिश्रमिक नहीं मिलने से अधिकांश लोग छुट्टा सांड की तरह खेत चरने को छोड़ दिया गया है अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए भाई लोग भी विवश हैं,वे चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिंट या बेब पोर्टल, सबसे अधिक शोषण तो संपादक मंडल ही कर रहा है जो ईमानदार शिक्षित बेरोजगारो का मानसिक हनन कर रहा है इनसे बेहतर तो अनपढ़ मजदूर हैं जो दिन भर काम की मजदूरी  से अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा है,आज हर व्यक्ति को आर्थिक आवश्यकता है यदि ईमानदारी से मिले तो ठीक अन्यथा दूसरा रास्ता लोग अपना रहे हैं,आखिर मीडिया क्यों विज्ञापन के नाम पर जनप्रतिनिधि हो या अधिकारी के तलवे चाटती है, जनपद स्तर से ग्रामीण स्तर पर कभी किसी ने छोटे संवाददाताओं का दर्द सुना, किसी ने आवाज उठाई, नही तो क्या आज के गिरते परिवेश में इसके जिम्मेदार कौन है यह भी सोचनीय है?
अभी है बहुत कुछ देखते रहे और पढ़ते रहे हमारे लेख समाज के पत्रकारों को दिखाएंगे आइना
नोट- यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हो सकते है इससे शिखर सत्ता का कोई वास्ता नही है।

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