ये कैसा रिश्ता-हेमलता त्रिपाठी

हेमलता त्रिपाठी

और बाबा मर गए। ‘रीना, बाबा नहीं रहे।’ ‘बाबा नहीं रहे।’ इन शब्दों ने मेरी तन्द्रा तोड़ दी। बाबा पिछले कई दिनों से मेडिकल कालेज में भर्ती थे। वे बहुत बुरी तरह से बीमार थे। कुछ दिन पहले एक रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। आनन फानन में उनके लिए शाहगंज से एक डॉक्टर बुलाया गया। उसने जवाब दे दिया तो उन्हें बी एच यू में भर्ती कराया गया। पर बाबा की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती चली गई और और आखिरकार बाबा चले गए।

“रीना, बाबा नहीं रहे।” मेरे माँ के इन शब्दों से मुझे दुखी होना चाहिए। बाबा यानी मेरे पिताजी के पिता। हमारे घर के बुजुर्ग। मुखिया। किसी बुजुर्ग का साया सर के ऊपर से उठना दुःख की बात होती है, पर मैं कतई दुखी नहीं हुई। रंचमात्र भी नहीं। उलटे खुश भी हो रही थी कि मेरी बात आखिरकार सच हो गई।
ये कैसा रिश्ता है जिसमें जो मेरे अपने होते जिनसे मेरा खून का रिश्ता होता हैं उनसे ही हमे क्यों दर्द मिला। बाबा ऐसे ही थे। आखिर मेरे मां पापा की गलती ही क्या थी? जो बाबा लगातार हमें सताते रहते थे। हम छोटे छोटे भाई बहनों की क्या गलती थी जो बाबा हमेशा उनके पीछे पड़े रहते थे। मेरे परिवार को मेरे अपने बाबा बहुत दर्द देते थे। जबकि उनसे तो हम प्यार, इज्जत, न्याय सम्मान और अपने अधिकार की उम्मीद करते थे, लेकिन मेरे परिवार को ऐसा कुछ नही मिला। इसकी बजाय मिली नफरत और प्रताड़ना।
मेरे समझ में नही आता था कि क्या रिश्ता ऐसा होता है? क्या अपने ऐसे होते हैं? क्या खून के रिश्ते ऐसे क्रूर और पत्थरदिल होते हैं? हमने बाबा से क्या क्या निवेदन नहीं किया। बहुत रोए गिड़गिड़ाए। पर बाबा नहीं पसीजे। हमने लाख प्रयास किए पर हमारे परिवार को वह कुछ नही मिला जिसके हम हकदार थे। आखिर मेरे पिता बाबा की ही तो सगी औलाद थे। पर मां पापा के साथ लगातार गलत होता गया। वो सहते गए। माँ पापा एकदम सीधे। लड़ाई करने की उनकी फितरत नहीं थी। ऐसे ही वो जिंदगी जी रहे थे। एक एक पल उनके लिए एक साल के बराबर था। समय बीतता गया। मैं दो बहन, दो भाई कुल 4 लोग हो गए थे। तब करीब मैं 9 या 10 साल की थी। पर चीजों को थोड़ा बहुत समझने लगी थी। दरअसल, हालात आपको मेच्योर्ड कर देते हैं। मैं उन हालातों को समझने लगी थी, जो कि मेरे परिवारऔर मेरे घर के थे जिनसे मेरे कई सारे अरमान और सपने जुड़े थे, लेकिन हुआ वह जो मैंने नही सोचा था। मैं छोटी सी बच्ची 9-10 साल की उम्र। लेकिन मैं नादान थी। हमारे परिवार को जो सताने वाले थे वो थे मेरे अपने बाबा, ताऊ, चाचा उन सबका पूरा परिवार जिसने मेरे मां पापा को मेरे भाई बहन सबको खूब सताया और एक परिवार की सारी  मान्यता उलट कर रख दी। हालांकि मेरा परिवार उम्मीद लगा के बैठा था कि हम सब एक छत के नीचे सब लोग मिलकर साथ रहेंगे, पर ऐसा कुछ नही हुआ।
इस दुनिया में बिना परिवार के कोई भी व्यक्ति अधूरा होता है क्योंकि परिवार हम सभी के जीवन का एक अभिन्न अंग है। परिवार कहे जाने वाले समूह में सामाजिक प्राणी के रुप में मानव जाति को देखा जाता है। पूरे जीवनभर के दौरान परिवार बहुत महत्पूर्ण भूमिका निभाता है। एक परिवार छोटा परिवार, छोटा मूल परिवार, बड़ा मूल परिवार या संयुक्त परिवार हो सकता है। एक परिवार में बहुत सारे रिश्ते हो सकते हैं जैसे बाबा-आजी यानी दादा-दादी, माता-पिता, पत्नी, पति, भाई, बहन, चचेरे भाई-बहन, चाचा, चाची, ताया-ताई आदि।
एक सकारात्मक परिवार अपने सभी सदस्यों को ढेर सारे सुविधाएँ उपलब्ध कराता है जहां हर कोई परिवार के अंदर एक बराबर जिम्मेदारियों को बाँटता है। बाबा या दादा अपने सभी बच्चों से समान प्यार करता है। अपने प्रेम और स्नेह की बारिश सब पर एक समान लुटाता है। एक-दूसरे की खुशी और दुख में परिवार का सदस्य भावनात्मक रुप से जुड़ा होता है। वो लोग एक-दुसरे को उनके बुरे समय में मदद करते हैं जो सुरक्षा का एहसास कराते हैं। एक परिवार पूरे जीवनभर अपने सभी सदस्यों को प्यार, उत्साह और सुरक्षा प्रदान करती है जो इसे एक पूरा परिवार बनाती है। एक अच्छी और स्वस्थ परिवार, एक अच्छे समाज का निर्माण करती है और एक अच्छे समाज से ही एक अच्छे देश का निर्माण संभव हो सकता है।
कवि नीरज जी ने लिखा है कि फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत, ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर ! है अदा यह फूल की छूकर उँगलियाँ रूठ जाना, स्नेह है यह शूल का चुभ उम्र छालों की बढ़ाना, मुश्किलें कहते जिन्हें हम राह की आशीष है वह,
और ठोकर नाम है-बेहोश पग को होश आना, एक ही केवल नहीं, हैं प्यार के रिश्ते हज़ारों, इसलिए हर अश्रु को उपहार सबका है बराबर। एक दिन की बात है। मैं और मेरे ताऊ का बेटा हम दोनो खेत में मटर तोड़ने गए। हम सबके खेत बराबर में थे। जैसे हम अपने खेत पहुँचे, थोड़ी ही मटर तोड़ी थी कि पीछे से बाबा भी पहुँच गए। हाथ में एक डंडा लिए हुए। बाबा मतलब आतंक। बाबा मतलब यमराज। हम दोनों डर के मारे खड़े हो गए। हम दोनों के हाथ में थोड़े से खाने के लिये मटर थे। बाबा का चेहरा हमे देखते ही गुस्से से लाल हो गया। हम थर थर कांपने लगे। बाबा बोले, ‘मटर कहा से तोड़ा है?’ हम दोनों ने बोला, ‘अपने अपने खेत से।’ वे गरजने लगे, ‘झूठ बोल रहे तुम दोनों, मेरे खेत से तोड़े हो। मुझे मत सिखाओ।’ हम दोनों सन्न रह गए। हम और कुछ बोल पाते इसके पहले बाबा हम दोनों को डंडे से मारने लगे। मार से बचने के लिए हम अपने खेत के पास एक महुवे के पेड़ के पीछे छुप गए, पर बाबा वहां भी पहुंच गए। हम चिल्लाने लगे। रहम की भीख मांगने लगे पर बाबा ने हमारी एक न सुनी। उन्होंने हम दोनों को बहुत जोर जोर से खूब पीठ पर मारना जारी रखा। मैं तो अपनी पीठ पकड़कर बैठ गई। मेरी तो आवाज नही निकल रही थी। मेरा भाई भी दर्द के मारे रो रहा था। मैं भी रोये जा रही थी। पर उस समय पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया, “तुमने मुझे बिना किसी गलती के मारा है। तुम बचोगे नहीं। तुम्हे भगवान मारेंगे। आज 12 बजे रात को तुम भी मरोगे।” ऐसे शब्द मेरे मुंह से दर्द के मारे निकल रहे थे। मैं तब छोटी थी। 10 साल की बच्ची को आखिरकार कितनी अक्ल होती है? बस वैसे ही मैं थीं। क्या करती। फिर रोते रोते घर चली आई। मेरी मां मेरी हालत सुनकर बहुत दुखी हुई। बोली, ‘रीना तुम्हें किसने मारा है?’ मैंने बोला, ‘बाबा ने।’ ‘क्यों मारा बाबा ने, किसलिये मारा?’ ‘माँ, मेरी गलती कुछ भी नहीं थी। मैं तो अपने खेत में मटर तोड़ रही थी। उन्हें बताया भी पर उन्होंने मेरी एक न सुनी।’ फिर मेरी मां बाबा को बोलने लगी। वे बहुत गुस्सा हुई लेकिन क्या करती आखिरकार चुप हो गई।
फिर रात हुई। बाबा की तबियत अचानक खराब हो गई। रात में मेरा पूरा घर परेशान हो गया। मेरे मां पापा भी जिसके साथ बाबा ने बहुत सारा अत्याचार भी किया था। लेकिन क्या करते वो लोग भी  दुखी हो गए। मामला रात का था। सबको सुबह का इंतजार था कि सुबह हो इनको बी एच यू में दिखाया जाए। सब यही सोच रहे थे, पर मैं एकदम निश्चिन्त थी। शान्ति से भोजन किया और सो गई। जैसे ही सुबह 5बजे मेरी नींद खुली देखा बहुत आवाज हो रही थी। मैं उठी तो अपनी मां पापा को रोते देख पूछने लगी क्या हो गया है? जैसे ही मां पापा ने बोला बाबा की बहुत तबियत खराब है। शाहगंज से डॉक्टर को बुलाकर दिखाया पर कोई फायदा नहीं हुआ तो उनको अब बनारस ले जा रहे हैं। इससे मैं बहुत खुश हो गई। जैसे लगता था कि मुझे कोई बहुत बड़ा उपहार मिल गया हो। मैं खुशी से पागल हो गई थी कि जिसने मुझे इतनी तेज से मारा कि अभी भी मुझे बहुत दर्द हो रहा है आज उसकी तबियत बहुत खराब है। मेरे मन उस समय ऐसा भी ख्याल आ रहा कि ये कब मरेगा तब मुझे चैन मिलेगा। और मेरे मां पापा भाई बहन को उनका पूरा हक मिलेगा।
मैं बहुत खुश थी। सुबह बाबा को बी एच यू ले जाया गया। वहां पर वे 10-15 दिन तक जिंदगी और मौत से लड़ते रहे। पर जीत मृत्यु की हुई। मुझे जैसे ही मालूम हुआ कि वो नही रहे मैं छोटी सी बच्ची जो कि बस उनके दिए हुए दर्द को समझती थी, बहुत खुश हो गई। सब रोते रहे पर मैं आनन्द के झूले में झूलती रही।
यह नजदीकी रिश्तों में व्याप्त कठोरता ही रही जिसने मुझे बाबा की मृत्यु का जश्न मनाने को मजबूर किया और मैंने जी भर कर जश्न मनाया। गोविन्द गुलशन के शब्दों में-आग थी सीने में चाहत की बुझानी पड़ गई। अपने हाथों ख़्वाब की बस्ती जलानी पड़ गई। इक समन्दर मैंने आंखों में छुपाया था ज़रूर, इक नदी पलकों में उसको भी छुपानी पड़ गई।
किसी का इस दुनिया से जाना तकलीफदेह होता  है। क्योंकि जाने वाला कभी लौटकर आता तो नहीं। बाबा भले मेरे अपने की तरह थे, पर हमारे पूरे परिवार पर जैसा जुल्म उन्होंने ढाया था उसकी वजह से उनके प्रति मेरे मन में न तो सम्मान था और न ही अपनापन। मेरे भाई बहन मां पापा बुआ सब सारे लोग परिवार के लोग रोते रहे लेकिन मेरी आँखों से एक बूंद आंसू नही निकले। जब मेरी माँ पापा उनके लिये रोये तो मैं कहती इनके लिये रो रही हो, ये मारते थे, हम लोगो को सताते थे, अच्छा हुआ मर गए, मैं बहुत खुश हूँ। घर पर जैसे बाबा की लाश आई सब चिल्ला चिल्ला के रोये जा रहे थे कि जैसे उनकी जुदाई में अपनी जान ही दे देंगे। लेकिन मेरी आँखों से उनके लिये एक बूंद आंसू नही निकले। कोई दुख नही हुआ। मैं बहुत प्रसन्न थी कि अब मेरे मां पापा को उनका हक मिल जाएगा। तब मैं क्लास 6 में पढ़ती थी। उस समय मेरा पेपर हो रहा था। मेरे दोनो भाई बहन ताऊ का लड़का सबने अपना पेपर छोड़ दिया। पर  मैंने नही छोड़ा। मैं उनके मरने वाले दिन भी अपना पेपर देने अपने स्कूल गई। मेरे टीचर ने कहा भी कि रीना आज तुम्हारे बाबा खत्म हो गए है। तुम जाओ मैं तुम्हे पास कर दूंगा। तब मैं अपने टीचर से बोली कि सर मैं आज बहुत खुश हूं उनके मरने से। अब हम थोड़ा सकून से जी सकेंगे। अब मेरे मां पापा को कोई नही सता पायेगा और मैं अपने पेपर आज बहुत अच्छे से लिखूंगी। क्योंकि सर मैं आज बहुत खुश हूं। यह सुनकर मेरे टीचर की आंखों में आंसू आ गए और वो मुझे अपने गले से लगाते हुए बोले बेटा आप अच्छे से पेपर दो। खूब आगे बढ़ो।
मैं पीछे जाकर सोचती हूँ कि हमे बाबा ने खूब सताया, बहुत तकलीफ दी। वह बर्ताव किया जो कि नही करना चाहिए था। वो मेरे परिवार के प्रमुख थे, मुझे उनसे ऐसी उम्मीद नही थी लेकिन बाबा मुझे कभी अपना नही मानते थे।  मुझे व मेरे परिवार को हमेशा वे दुश्मन की नजर से देखते थे। मेरे बाबा ने मेरे मां पापा को कुछ नही दिया। यहां तक कि सर छुपाने की जगह भी नहीं। जो घर की छत थी वो भी रहने के लिये नही दिया। सब छीन लिया पापा मां से। उस समय मेरे दो भाई और दो बहनें थी। मैं लगभग 3 साल की थी जब मेरे बाबा, मेरे ताऊ सबने मिलकर मेरे मां पापा को घर से निकाल दिया। मेरे मां पापा को रहने के लिए कोई जगह नही थी। बहुत कोशिश करने पर, खूब गिड़गिड़ाने के बाद उन्होंने पापा जो जगह रहने के लिए दी थी जमीन वो एकदम जंगल थी। बगीचे में तालाब के पास थी, जहां हमेशा साँप कीड़े निकलते रहते थे। ऐसी जगह पर को रहने लायक हमने बनाया। हम छोटे भाई बहन शाम होते ही डरने लगते थे। क्योंकि मेरे पास प्रॉपर घर नही था। मेरे पापा मां झोपड़ी बनाकर हम सब भाई बहन को लेकर अंधेरे में उस जंगल में रहते थे। दिन तो जैसे तैसे निकल जाता था, पर रात पहाड़ सी लगती थी। जब बरसात का मौसम आता था तब हमारे पूरे घर मे पानी भर जाता था। फिर हमारा घर घर कम तालाब ज्यादा लगता था। हमें बहुत डर लगता था कि हम कहीं उस तालाब में बह न जाएं। लेकिन ऐसे ही कई सालों तक चलता रहा। हम तकलीफ झेलते रहे पर मेरे बाबा ताऊ हमारी इस दुर्दशा को देखकर बहुत खुश रहते थे। हम यही सोचते थे कि आखिर मेरे पापा मां के साथ ऐसा क्यों हो रहा है? मेरे मां पापा ने इनका क्या बिगाड़ा है? बाबा सबको तो मानते हैं पर हमें क्यों नहीं?  मेरे मां पापा के साथ इतना जुल्म क्यों ढा रहे हैं? ऐसे कई सवाल थे, पर मुझे एक भी सवाल का जवाब नहीं मिल रहा था। मैं छोटी सी बच्ची समझ नही पा रही थी कि इस दुःख का कारण क्या है? मेरे पापा अच्छी नोकरी करते थे लिहाजा किसी तरह से वो हम लोगों का पालन पोषण करते थे। लेकिन दुःख की घड़ी तब आई कि मेरे पापा की नोकरी छूट गई। उनको निलंबित कर दिया गया। एक आदमी की वजह से उन्हें इस हालत से दो चार होना पड़ा। बिना किसी अपनी गलती के। पर होनी को कौन टाल सकता है। पापा के निलंबन से मेरे घर पर परेशानियों का गाज टूट पड़ा था। मेरे पापा मां को कुछ समझ नही आ रहा था अब वो क्या करें। हम चार लोगों को पढाना लिखाना घर को चलाना सब मुश्किल सा लग रहा था। मेरी मां अपनी बदकिस्मती पर रोये जा रही थीं। उनके साथ बहुत गलत हो रहा था। वो कुछ समझ नही पा रही थी, कि करें तो क्या करें। अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर कहा जाऊं। क्या करूँ। किस्से मदद मांगूं। रोते हुए मेरी मां इन शब्दों को बार बार कहती रहती थी। तब मेरे पापा ने बाबा से कहा कि पिता जी, मेरी हालत बहुत खराब है। मुझे खेती करने के लिये कुछ जमीन दे दो। मेरे बच्चे क्या करेंगे। क्या खाएंगे। इसके उत्तर में बाबा भड़क गए और कह दिया कि जय प्रकाश तुम्हें तो मैं एक इंच जमीन भी नहीं दूंगा। हमारे अपने हिस्से की जमीन देने की कौन कहे, उसके बाद तो बाबा का जुल्म और बढ़ गया। वे मेरे पापा मां से और मारपीट करने लगे, लड़ाई करने लगे। बोलते लगे कि जय प्रकाश तुम्हारा यहाँ कोई हिस्सा नहीं है। ये सब कुछ मेरा है। हम अपने जीते जी तुम्हे कुछ नही देंगे।
कहते हैं कि जो गिरकर रोया नहीं कभी, वह उठकर हंसना क्या जाने। जिसकी हुई पराजय नहीं, वह् विजय मनाना क्या जाने। हर गम की काली रात के बाद सुहानी सुबह आती ही है। बाबा के जुल्म के गम की रात में ननिहाल रूपी सुहानी सुबह आ गई। मेरे घर से 1 किलोमीटर की दूरी पर मेरा ननिहाल था। जब मेरे नाना को नानी को ये सब पता चला तो उन्होंने पापा की खूब मदद की। खूब संभाला। फिर कई सालों बाद मेरे पापा ने गांव समाज के लोगो को बुलाया और सबने बैठ कर बातचीत की। लोगों के बहुत समझाने पर, लड़ाई झगड़ा करने के बाद पापा को थोड़ा सा उनके हिस्से का खेत मिला। जिसमे मेरे पापा थोड़ी बहुत भर्ती लगा के खेती करने लगे। मेरे बाबा और उस परिवार के सारे लोग मेरे पापा  मां से हम लोगों से इतना जलते थे कि उन्हें हमारी कोई भी प्रगति रास नही आती थी। जब देखो तब वो इसी फिराक में रहते थे कि वो मेरे परिवार को तकलीफ दें।जब मेरे पापा घर में कुछ अच्छा करने लगते तब सब उनके रास्ते में अड़ंगा डालते। मेरे बाबा तो पापा को उनके हिस्से की जमीन में भी कुछ करने नही देते थे, बोलते थे कि यहां पर कुछ नही बनने दूंगा। तुरंत लाठी डंडे से सब मिलकर मारपीट करने लगते थे। मेरे पापा एकदम अकेले पड़ जाते थे। उनकी तरफ से कोई लड़ने वाला नही था। मेरे बाबा ने मेरे मां पापा को इतना सताया था कि वे टूट गए थे। मेरे पास पानी पीने के लिए नल नही था। जैसे ही मेरे पापा नल लगवाने लगे। बाबा ताऊ सब इकट्ठा हो गए। चिल्लाने लगे नल नही लगेगा। किसी कीमत पर नहीं। मेरे पापा ने निवेदन किया कि मेरे बच्चे छोटे हैं वे कुएं से पानी नही भर पाएंगे। कैसे पियेंगे, कैसे नहाएंगे। लेकिन मेरे बाबा ने एक न सुनी। उन्होंने मिस्त्री को भगा दिया। फिर बहुत मुश्किल से मेरे घर मे नल लगा।वो मेरे पापा को कोई भी काम नही करने देते थे। जब कभी मैं अपने खेत जाती थी तो वो पीछे पीछे जाते थे।
पर यह भी सच्चाई है कि बाबा के  मरने के बाद से लड़ाई खत्म नही हो गई। क्योंकि एक दुश्मन हो तो ठीक। पर जब पूरा परिवार ही देख कर जल रहा है तो क्या कर सकते हैं। लेकिन मेरे मां पापा भाई बहन मारपीट गाली सब सहते हुए आज उसी जमीन पर शान से सुख से रह रहे हैं। जहाँ मेरे बाबा ताऊ चाचा सबने एक नल भी नही लगाने दिया था। वही आज उसी जगह पर मेरा सुंदर सा घर बना है। एक नही तीन तीन नल लगे हुए हैं। मेरे घर में हर एक सुख सुविधा है। मेरी वो बहन जिसको इन लोगो ने खूब सताया था आज कई साल हो गए उनकी शादी हो गई। बहुत अच्छे घर परिवार में आज वो रांनी की तरह रहती है। मेरा भाई अपने परिवार के साथ खुशी से रह रहा है। आज वो अपने जीवन मे खूब आगे है। मेरा एक भतीजा हो गया है जिसका नाम सार्थक है। छोटा भाई बड़ा हो गया है। बाहुबली की तरह। छोटी सी बहन मेरी बहन कम बेटी ज्यादा है क्योंकि मैं बचपन से ही उसको बहुत प्यार करती थी आज भी करती हूं, पूरी जिंदगी करती रहूंगी। जिंदगी की आखिरी सांस तक मैं उसको प्यार करती रहूँगी। मेरा उससे बहुत प्रेम है। आज डॉक्टर विनीता के नाम से लोग उसको जानते हैं। बहुत सारे उतार चढ़ाव के बाद आज मेरा पूरा परिवार बहुत खुश है। मेरे पापा को फिर से उनकी ड्यूटी मिल गई है। यह समय अब रिश्ते की सार्थकता का है।

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