भुला न पाया-मो.शकील की गजल

मो.शकील

भुला न पाया

भूला खुदा को अपने पर तुझको भुला न पाया,
क्या तेरी आरजू थी, जो मैं समझ न पाया।
बस याद में तेरी मैं, आंहें हूँ भर रहा,
पाने को मैं तुझे सजदा हूँ कर रहा,
क्या तेरी जुस्तुजू थी जो मैं न जान पाया,
भुला खुदा को अपने पर तुझको भुला न पाया।
आंखों में चुभ रहा है, नश्तर सा याद वो,
जो करता रहा खुदा से तुझे पाने की फरियाद वो,
क्या ऐसा जलजला हुआ जो कर गया पराया।
तू सुबहो शाम है मेरी, ये कैसे भूल पाऊं,
ऐसा अगर कभी हो, दुनिया ही छोड़ जाऊं,
क्या फिर से मिलन न होगा, क्यों कोई न बताया।
मैं इश्क ऐ फिजा में तेरा दीवाना हो गया हूँ,
दुनिया की नजरों में, मैं बेगाना हो गया हूँ।
दुनिया की बन्दिशों ने मुझको बहुत सताया।
मैं उस कारंवा में चल रहा जिसकी न कोई मंजिल,
दे तू पता शकील अब, है दूर कितनी मंजिल,
तुझपे ही है भरोसा बाकी ने भरमाया।
भुला खुदा को अपने पर तुझको न भुला पाया।।

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