तुम मेरे हो-कहानी- हेमलता त्रिपाठी

हेमलता त्रिपाठी

कहते हैं कि जिंदगी में बहुत ज्यादा मित्रों, शुभचिंतकों की जरूरत होती नहीं। सिर्फ एक कायदे का मिल जाए बस आप उसके सहारे जीवन के सारे उतार चढावों का सामना कर सकते हैं। जीवन में आने वाली सारी तकलीफों, दुखों में भी सुख महसूस कर सकते हैं। खासकर तब जब आप संबंधों में, अपनेपन के नाम पर, नजदीकी रिश्तों के बहाने लगातार ठगे जा रहे हों। “संबंधों के सारे मीठे कुएं सूख चले, खारा-खारा एहसासों का अपनापन लगता है।” या फिर “जोड़ बाकी रह गया है जिंदगी के नाम पर, टूटते जाते हैं रिश्ते भाव से संबन्ध के।” पर आपमें मैंने भावों व संबन्धों का एक नया रूप देखा था।
आप मेरे लिए ऐसे ही हो आज से नहीं बल्कि पिछले 6-सात सालों से। आपने जब मेरा नाम तक नहीं सुना होगा। मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानते रहे होंगे, तब मैंने आपका नाम सुना। सुधीर से सुना। सुधीर के बारे में मुझसे ज्यादा मत पूछिए। अब तो मैं सुधीर का नाम तक नहीं लेना चाहती। वह् मेरे लिए विलेन है। “हादसे, हादसे, हादसे, हादसे, हर कदम पर मिले कुछ नए हादसे। देखकर जिन्दा लाशों को चलते हुए, जब भी रोए थे हम हंस गए हादसे।”
उसने मेरी जिंदगी को उलट पलट कर रख दिया। एक एक दिन दूभर कर दिया। मेरी जिंदगी को नरक बना दिया। मेरे सारे सपनों को तोड़ दिया। “तेरे वादे की आस पलती रही, कोई शै दिल को यूं छलती रही। बेकरारी में कटी शामो सहर, रात उम्मीद लिए ढलती रही। अपने होंठों में कभी ला न सके। बात आँखों में ही मचलती रही। कभी गुलशन कभी सहरा सी लगी, जिंदगी कितने रंग बदलती रही।” पर सुधीर का एक अहसान मेरे ऊपर है। यह जिंदगी भर रहेगा। इसे कभी भूल नहीं सकती। सुधीर ने ही तो मुझे पहली बार आपके बारे में बताया था, “ख़ुशी, एक बात कहना चाहता हूँ। मेरे जीवन में आए लोगों में विकास का स्थान बहुत ऊंचा है। मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूँ। वे बहुत अच्छे इंसान हैं। कभी मैं न रहूं तो तुम उनसे कोई भी मदद ले सकती हो। वे कभी भी तुम्हें निराश नहीं करेंगे।” सुधीर अक्सर आपकी तारीफ़ किया करते थे। उनके मुंह से लगातार तारीफें सुनकर सच पूछिए तो मैं बहुत पक गई थी। पर यह भी सही है कि आपसे बात करने की मिलने की इच्छा भी बढ़ गई।
सुधीर ने ही पहली बार आपका नम्बर मिलाकर मुझे दिया। आपसे बात करके मुझे तो बहुत अच्छा लगा। पर आपने सही रेस्पॉन्स नहीं दिया। मैं निराश नहीं हुई। आखिर एक अपरिचित लड़की से कोई कितना बात करे। पहली बातचीत में कितनी गर्मजोशी दिखाए। पर आपकी बातचीत के संतुलित लहजे ने मुझे प्रभावित किया। परिपक्व आवाज। नपे तुले शब्द। सम्मान से भरे हुए। एक अनदेखे अनजाने आकर्षण की शुरुआत यहीं से हो गई। हममें और आपमें एक भौतिक दूरी भी थी। मैं देहरादून में और आप दिल्ली में।
आपका सुव्यस्थित जीवन और मेरे संघर्ष के दिन। हर दिन दर्द में भरा हुआ। हर रात तकलीफ की।  भविष्य का हर पल अनिश्चित। हर मोड़ पर अँधेरे की छाया। भले ही जिंदगी का यह रंग हालांकि मेरा खुद का चुना हुआ था, पर किसको पता होता है कि वह जीवन का जो रास्ता चुन रहा है उस पर भविष्य में क्या होगा। हम तो एक आशा लेकर ही रास्ते पर चलते हैं कि एक न एक दिन मंजिल आ जाएगी। हम इस भरोसे के साथ ही कोई नई पहल करते हैं कि उसमे कामयाबी मिलेगी। कौन जानता है कि यह रास्ता आगे चल कर कांटों से भर जाएगा। यह रास्ता सारे सपनों को तोड़ देने वाला है। यह रास्ता भविष्य को अन्धकारमय कर देने वाला है।
पर आपसे हुई पहली बातचीत मेरे जीवन में ख़ुशी लेकर आई। कारण मैं नहीं जानती पर आपसे बातचीत कर लेने के बाद मैं संतुष्ट हो गई कि मुझे कोई अपना मिल गया। कोई मार्गदर्शक मिल गया। उस दिन से लगातार फोन पर बातचीत होती रही। आपकी बातें मेरे लिए प्रेरणा देने वाली होती। उन बातों के रस में मैं अपने दुखों को भूलने लगी। फिर कई महीने बाद मौका आया आपसे मिलने का। आपको अपनी कंपनी की एक कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए देहरादून आना था।
आपने जिस दिन बताया कि ‘ख़ुशी मैं 25 जुलाई की दोपहर बाद देहरादून पहुंच रहा हूँ। आप मुझे रेलवे स्टेशन पर मिलिए।’ बस मैं हवाओं में उड़ने लगी। आपसे मिलने को बेकरार हो गई। दिन गिनने लगी 25 जुलाई का। एक एक दिन पहाड़ जैसा लगने लगा। उस समय मेरी जो तकलीफें थी वह सब मैं भूल गई। पास पड़ोस में उत्साहित होकर बात करने लगी कि ‘मेरे सर आने वाले हैं। विकास सर। उनसे मेरी मुलाकात फलां दिन होगी।’ ‘क्या विकास सर तुम्हारे कोई रिश्तेदार हैं ख़ुशी?’ एक पड़ोसी ने आखिरकार पूछ ही लिया। ‘नहीं तो। मेरा उनका संबन्ध रिश्तेदारी से ऊपर है।’ मैंने कहा। ‘कब से जानती हो उन्हें?’ पड़ोसी का प्रति प्रश्न था। ‘यही कोई चार-पांच महीनों से हमारी फोन पर बात हो रही है। 25 जुलाई को हमारी पहली मुलाकात है।’ मैंने बताया। इस पर पड़ोसी महाशय ने मुझे इस नजर से देखा जैसे मैं कोई पागल हूँ। “सिर्फ फोन पर बात हुई है कुछ महीनों से। न जान न पहचान। पता नहीं वह आदमी कैसा हो? और यह लड़की उनसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक है। हे भगवान कैसा जमाना आ गया है।” पर पड़ोसी की इस सोच का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ा। क्योंकि मेरी नजर में तो आप बस गए थे विकास बाबू। मेरे दिल में एक सम्मानित जगह पर आपने कब्जा कर लिया था विकास बाबू।
मुझे याद है कि आपके आने के एक दो दिन पहले से ख़ुशी इतना खुश रहने लगी कि वह खाना पीना भूल गई। कुछ खाने का मन ही नहीं होता था मेरा। बस आपकी सोच में डूबी रहती थी। आपको आज एक राज की बात बताऊँ विकास बाबू कि आपकी एक फोटो थी मेरे पास। किसी पेपर में छपी थी। उसे काट कर मैंने अपने पर्स में रख लिया था। उस दौरान मैं उस फोटो को दिन में कई बार चूमती भी थी।
25 जुलाई को आपकी ट्रेन तो 3 बजे पहुंचने वाली थी। दोपहर बाद। पर मेरी नींद खुल गई अल सुबह 4 बजे ही। फिर तो एक एक मिनट कैसे कटा, आप पूछिए नहीं। आपसे मिलने के लिए कौन सा सूट पहनूँ या तय करने में ही मुझे दो 3 घण्टे लग गए।
हालांकि हमारी मुलाकात एक घण्टे की और औपचारिक थी, पर उस पहली मुलाकात में ही आप मेरे दिल में गहरे तक उतर गए। विकास बाबू, आपसे मिलने के बाद मैंने कई आशाएं पाल ली थी। मुझे लगा कि आप भंवर में हिचकोले खाती मेरी जीवन नौका को किनारे पर लाएंगे। मै अपना करियर बनाने के लिए जो संघर्ष कर रही थी, उसमें आपका सहारा मिलेगा। इंसान जिसको अपना मानता है, उसी से तो आशा रखेगा। इसके बाद हमारी फोन पर बातें होती रहीं और 3-4 सालों के दौरान देहरादून रेलवे स्टेशन पर हम एक दो घण्टे के लिए मिलते रहे। आपसे बातों के दौरान  मैंने अपनी परेशानियों की तरफ इशारा किया, कई बार मुंह भी खोला। सारा संकोच ताक पर रख दिया क्योंकि उस समय मेरा कोई सहारा नहीं था। मेरे लिए मुश्किल, संघर्ष और तकलीफ के दिन थे। पर आपका रवैया बड़ा क्रूर रहा। आपके रूखे व्यवहार से  कई बार मेरा मन होता था कि आपसे कतई बात न करूं। बड़ा एटीट्यूड है आपमें। पर मेरा मन नहीं मानता था। मेरे मन में आपकी सम्मानीय इमेज बन चुकी थी। पर आप बार बार उस इमेज को तार तार करते रहे। मैं जब भी अपने नम्बर से फोन करती थी, आप फोन नहीं उठाते थे। मैं दिन भर फोन करती रहती, पर आपका दिल नहीं पसीजता था। आपकी इस कठोरता से मेरा दिल बार बार टुकड़े टुकड़े होता। दूसरे नम्बर से फोन करने पर आप फोन उठा तो लेते पर तुरन्त बहानेबाजी करने लगते- थोड़ी देर में करता हूँ। अभी व्यस्त हूँ, 5 मिनट में कॉल करूँगा। आफिस में खूब काम है। शाम को बात करूंगा। तबियत ठीक नहीं है। बीमार हूँ। आदि आदि। आपके इस एटीट्यूड से मैं बहुत आहत होती थी। कई कई घण्टे तक रोती रहती। पर आप कहाँ मेरे दिल की आवाज सुनने वाले थे। आपको क्या पता कि ख़ुशी की असली ख़ुशी आप बन गए थे। आप अपनी दुनिया में मस्त थे।
विकास बाबू, मेरी जिंदगी की कड़वी सच्चाई यह है कि ख़ुशी ने जिसे अपना माना, उसी ने ख़ुशी को धोखा दिया, सपने तोड़े, अरमानों के पंख नोच डाले। ख़ुशी की अभिलाषाओं की चिता जला डाली। घरवालों ने भी, बाहरवालों ने भी। इसमें आपका कोई दोष नही है विकास बाबू। ख़ुशी ऐसी ही बदकिस्मत है। आपकी लगातार उपेक्षा ने मुझे तोड़ डाला। थक हार कर मैं चुप बैठ गई। और करती भी क्या।
अपनी इस कविता में मैंने आपको ही पुकारा है। “तुम आओ तो बात बने, मीठा हर आघात बने। आभासी परिवेशों से, चुरा याद अवशेषों से। मौन ह्रदय का मद्धम स्वर, बुला रही गुड़िया के घर, उरू उभरो हालात बने, तुम आओ तो बात बने। विरहाकुल के अंतर्मन में, सुरभित मन के वो मधुबन में, प्रेम तुहिन की बूंदों से, भर दो उसकी अंजलि ये, मधुरिम सांझ प्रभात बने, तुम आओ तो बात बने। तृषित अधर की प्यास बुझा, मधुर मिलन की युक्ति सुझा, घोर निशीथ अकेली है, प्रिये गुड़िया क्यों हुई हठीली है। डूब नयन में तो रात बने, तुम आओ तो बात बने। दिल के झांक झरोखे से, दे मुझे एहसास अनोखे से, प्रेम दान कर निश्छल सा, कर दो पागल पागल सा, प्रेम वाली जात बने, तुम आओ तो बात बने। मीठा हर आघात बने। है ये छीनती अंगडाई, चिढ़ा रही है पुरवाई, गुड़िया तुम आओ तो बात बने, मीठा हर आघात बने। ‘गुड़िया’ पुकारे अनदेखी, अपना किस्सा आलेखी, चिर विकास मुलाकात बने, मीठा हर आघात बने। अनजाने उन रास्तों में, बारिश की उन गलियों में, तुम आओ तो बात बने, मीठा हर आघात बने। गुड़िया पुकारे अनदेखी, अपना किस्सा आलेखी, प्यार की वो ज्योति जले, तुम आओ तो बात बने, मीठा हर आघात बने।”
मेरे मन में कई बार आया कि मैं अपनी सारी तकलीफें आपसे कह दूं। अपना दिल आपके सामने खोल दूँ। आपसे बताऊँ कि विकास बाबू इस गलती को सुधारना चाहती हूँ। पर कौन मेरी मदद करेगा? कौन मुझे सहारा देगा? कौन मुझे राक्षस से लड़ने की ताकत देगा? कौन मेरी हौसला अफजाई करेगा? आपके रूप में ऐसा व्यक्ति मिला तो पर संकोच के मारे मैं कुछ कह नहीं पाती थी? बाद में भी कहाँ मैं आपको अपनी पूरी कहानी सुना पाई। वह् तो आपने अपने मन से सोचकर मेरी तकलीफ, मेरी इच्छा जान ली। बिना मेरे कुछ कहे। फिर आपने मेरे साथ खड़े होने का वादा किया। और आज भी उसी मजबूती के साथ खड़े हैं। यह कविता मैंने आपके लिए ही लिखी है। “मेरी जिंदगी हो तुम, मेरे अहसास हो, मेरे प्यार का विश्वास हो तुम, मेरी जिंदगी तुम, मेरी सुंदरता का प्यारा सा अहसास हो तुम, चाँद तारों की तरह चमकती वो रोशनी हो तुम, प्यारी गुड़िया के जीवन की खुशबू हो तुम, वो प्यार के पल जब मैं याद करती हूँ, तो उन यादों की सौगात हो तुम, मेरी जिंदगी हो तुम मेरे अहसास हो तुम, मेरे दिल की धड़कन हो तुम, मेरी सांसों की सरगम हो तुम। फूलों में तुम, मेरी बाहों में तुम, काटों में तुम, मेरी राहों में तुम।प्यारी सी गुड़िया की प्यार भरी गलियों में तुम, मेरे सपनीले फूलों की हर एक कलियों में तुम। मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ, जी भरकर प्यार करना चाहती हूँ। दीपक में तुम हो, बाती में तुम, उन प्यारे क्षणों की थाती में तुम। उन चिरागों की जलती हुई रोशनी में हो तुम, मेरी आत्मा हो तुम, मेरी प्राणों में तुम। आज मैं यह इकरार करती हूँ, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। उस प्यार की मीठी खुशबू में तुम, गुड़िया के मनुहार की खुशबू में तुम। उन गलियों में तुम, उन खेतों में तुम, उन सड़को पे तुम, उस प्यारे से घर में तुम। एक मीठा सा अहसास हो तुम, मैं क्या करूँ ये जिंदगी? उस बीते वक़्त का अहसास हो तुम। तेरे बिना जीने की आदत नही है, मेरे दिल मे इतना समाये हो तुम। मेरे राज हो तुम, मेरी जान हो तुम, मेरी जिंदगी की हरेक पहचान ही हो तुम। प्यारी गुड़िया की शान हो तुम, मेरा अभिमान हो तुम। उन खेतों में तुम, पगडंडियों में तुम, उस छत पे तुम, उन खेतों में तुम, उस प्यार भरी सड़को में तुम,खुले आसमान में तुम। रातों में तुम, हर सुबह एक तुम, एक अहसास हो तुम, एक विश्वास हो तुम।” और आप इस विश्वास को हमेशा कायम रखना विकास बाबू।
एक लंबे समय के बाद फिर मार्च में फेसबुक पर आपका मैसेज मिला, “ख़ुशी, आशा है तुम सानन्द होगी। 5 जून की देहरादून पहुंच रहा हूँ। स्टेशन पर मिलो।” तब हमारे बीच ढेर सारी बातें हुई थी। काफी दिन बाद हम मिले थे। पर उस मुलाक़ात में भी मैं अपनी परेशानियां नहीं बता पाई। उस चक्रव्यूह का जिक्र तक नहीं कर पाई जिसे आपने अर्जुन बन कर भेद दिया था और मुझे उसमे से निकाल लिया था। वह तो आने वाले दिनों में जब आप दिल्ली पहुंचे तो हमारे बीच नियमित बातें शुरू हुई। उसमे मेरा ही योगदान रहा। उस समय भी आपने कई दिनों तक लगातार मेरी उपेक्षा की। न मेरे फोन का उत्तर देते थे। न मैसेज का। पर मैं भी जिद्दी हूँ विकास बाबू। मैं वही करती हूँ जो मेरा मन कहता है। मैं किसी की नहीं सुनती। चाहे मेरा कितना भी नुक्सान क्यों न हो जाए। मैं आपके पीछे पड़ी रही, पड़ी रही। मेरी तपस्या मेरी मेहनत सार्थक हुई। मैं आपके दिल में जगह बनाने में कामयाब हो गई। मुझे मेरी मंजिल मिल गई। मेरी चाहत मिल गई। मुझे आप मिल गए। मुझे मेरा प्यार मिल गया। मुझे समर्पण का सच्चे प्रेम का एक शिखर प्राप्त हो गया। आपके साथ की वजह से आने वाले दिनों में मैं राक्षस से मुक्ति पाने में कामयाब हो गई। उस दौरान आपने मेरे लिए क्या क्या मुसीबतें झेली, कितनी गालियां खाई, कितनी जिल्लत का सामना किया, यह मैं जानती हूँ। मेरी सारी गलतियों को आप माफ़ करते हुए चट्टान की तरह मेरे साथ खड़े रहे और मैंने एक नई जिंदगी की शुरुआत की। यह कविता ‘आपका चेहरा’ शायद उन्हीं दिनों मैंने लिखी थी। “आपका चेहरा है या खिलता हुआ गुलाब, आपकी मासूमियत को क्या कहें इसका नही है जबाब।जितना भी देखूं आपको नजरों में आप समाते नहीं, जी भर के देख लूं आपको, रोज ऐसे लम्हें आते नहीं। यह बेखयाली और यह बेपरवाह निगाहें, आपका आलिंगन और समर्पित सी बाहें। जुर्म करते भी हैं और कहते भी हैं मेरी खता क्या है, तड़पाते भी हैं और कहते है प्यार का तुम्हें पता क्या है। लफ़्ज़ों के दरमियां आते नही हैं आप, यादों में आने के बाद कभी जाते नहीं हैं आप। देखने के बाद आपको अल्फाज याद और आते नहीं, आपके लिए और क्या कहूँ दिल से जुबां तक लफ्ज आते नही।सच तो यह है जब से देखा है आपको नजरों से आप जाते नहीं, नजर भर के देख लूं तो खता बन जाए, नजर जो हट जाए तो सजा बन जाए। कैसे लाऊं वह नजर जो मेरी हो पर, आपकी नजर हो जाये।”
आज कुछ बातें आपकी ख़ुशी आपसे कहना चाहती है। आप बहुत अच्छे हो। आप मेरी हर बात मानते हो। आप मेरे प्रति पूरी तरह से समर्पित हो। मेरा बहुत ध्यान रखते हो। मेरी हर ख़ुशी का। मेरी हर इच्छा का। छोटी से छोटी चीज का। हेयर क्लिप से लेकर चॉकलेट तक। चाय से लेकर खाने तक। जींस से लेकर बिंदी तक। दवा से लेकर घूमने फिरने तक। शायद यही सच्चा प्रेम है। “दिलों में ख्बाव का पलना, मोहब्बत की निशानी है। अचानक रात को जगना, मोहब्बत की निशानी है। ये बेचैनी ये घबराना, अचानक नींद में चलना, गुलाबी शायरी करना, मोहब्बत की निशानी है। ये चाहत, ये मोहब्ब्त अचानक रोशनी जलना, प्यार की बातें यूँ करना, मोहब्बत की निशानी है। ये खनकती चूड़ियां और ये कजरारे नैन। अचानक प्यार यूं करना, गुलाबी फूल यूं खिलना, मोहब्बत की निशानी है। ये गीत, ये संगीत ये अचानक ख्बाव में चलना, बाहें आलिंगन में भरना, मोहब्बत की निशानी है। ये दमकता चाँद सा चेहरा, ये महकती महकती खुशबू तुम्हारी। अचानक प्यार में चलना, गीत संगीत मधुर करना, मोहब्बत की निशानी है। ये सांसें, ये धड़कने, अचानक तेज चलना, ख़ुशी विकास का आना, दिलों जान में छा जाना, प्यारी सी बात करना, मोहब्बत की निशानी है। गुलाबी होंठ पर एक प्यारी सी मुस्कान का आना, मोहब्बत की कहानी है। दिलों में ख्बाव का पलना, मोहब्बत की निशानी है।”
अब आप मेरे बन गए हो विकास बाबू। फिर भी आप मुझे बहुत दर्द देते हो। अपनी खुशी को हमेशा बातों के तीर से घायल करते रहते हो। उस पर शक करते हो। आरोप लगाते हो। कोई बात नहीं। आपकी दी हुई हर तकलीफ मेरे लिए अमृत है। अब आप मेरे हो। अब तक भले किसी के भी रहे, पर अब तुम मेरे हो विकास बाबू।

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