महर्षि च्यवन मुनि की तपोस्थली मां कालिकन भवानी के सरोवर में स्नान करके समस्त चर्मरोगों का विनाश होता

मां कालिकन धाम

अमेठी, 20मार्च (शिखर सत्ता)।  नवरात्र के प्रत्येक दिन कालिकन धाम में देवी की कृपा पाने के लिए श्रद्धालुओं का मेला लगता है। अमेठी ही नहीं आसपास के जिलों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मां कालिकन धाम का वर्णन देवी भागवत व सुखसागर में किया गया है। मान्यता है कि कालिकन देवी भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।अमेठी शहर से 12 किमी दूर स्थापित मां कालिकन भवानी का रोचक इतिहास है। नवरात्रि के दिनों में यहां लोगों का हुजूम देखते ही बनता है। महर्षि च्यवन मुनि की तपोस्थली के सरोवर में स्नान करके समस्त चर्मरोगों का विनाश होता है। यहां के शक्तिपीठ अध्यात्म से जुड़ा है।

कालिकन देवी

महर्षि च्यवन की तपोस्थली के रूप में पुराणों में जिस स्थल का वर्णन किया गया है। पुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार अयोध्या नरेश सरियाद के एक ही पुत्री थी जिसका नाम सुकन्या था। महर्षि च्यवन की तपोस्थली वन विहार के दौरान वह यहां के जंगल में आई थीं। महर्षि च्यवन मुनि यहां पर तपस्या कर रहे थे। तप करते-करते महर्षि के शरीर पर दीमक लग गया। दीमक के बीच आंखे मणि की तरह चमक रही थी। कौतूहल बस सुकन्या मणि समझकर दीमक के बीच से कांटे द्वारा निकालने का प्रयास करने लगी जिससे महर्षि की आंखे फूट गई। इसके बाद राजा सरियाद के सैनिक व पशुओं में ज्वर फैल गया। एक साथ सैनिक व पशुओं में एक ही बीमारी होने पर राजा को दैवीय प्रकोप की आशंका हो गई। राजा को सुकन्या ने बताया कि उनसे ऐसा अपराध हो गया है। राजा ने तपस्वी के पास पहुंचकर महर्षि के शरीर को साफ कराकर बाहर निकाला। शाप से बचने के लिए सुकन्या का विवाह महर्षि के साथ करके वापस चले गए।

कालिकन देवी

कालांतर में अश्विनी कुमार महर्षि की तपोस्थली पर आए। महर्षि को युवा व उनकी ज्योति वापस करने की बात कही। अश्विनी कुमार ने कहाकि बदले में महर्षि को यज्ञ में हिस्सा व सोमपान करना होगा। वार्ता तय हो जाने पर अश्विनी कुमार ने तपोस्थली के पास बारह तालिका बनाई। जो अब सगरा का रूप में स्थापित है। सरोवर में कुमार ने औषधि डाल दी। महर्षि के साथ सरोवर में डुबकी लगाई। डुबकी लगाने के बाद बाहर निकलने पर तीनों एक रूप के निकले जिससे सुकन्या विचलित हो गई। सुकन्या ने अश्विनी कुमार की आराधना की तो वे देव लोक वापस चले गए। महर्षि की ज्योति व युवा हो जाने पर सुकन्या व महर्षि एक साथ प्रेम से रहने लगे।

महर्षि च्यवन मुनि
महर्षि च्यवन मुनि व माता सुकन्या

महर्षि के अनुरोध पर अयोध्या नरेश ने सोमयज्ञ कराया। जिसमें अश्विनी कुमार को सोमपान कराए जाते देख कुपित इंद्र ने राजा को मारने के लिए वज्र उठा लिया। च्यवन ने स्तंभन मंत्र से इंद्र को जड़वत कर दिया। यज्ञ के बाद देवताओं ने निर्णय लिया कि अमृत की रक्षा कौन करेगा। देवताओं व महर्षि ने शक्ति का आहवान किया तो मां भगवती अष्टभुजी के रूप में प्रकट हुई। देवताओं व महर्षि के अनुनय पर भगवती अमृत की रक्षा के लिए तैयार हुई। अमृतकुंड पर शिला के रूप में स्थान ले लिया। इसके बाद देवता देव लोक चले गए और महर्षि व सुकन्या मथुरा चले गए।

योगेन्द्र श्री वास्तव

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