समाज का वास्तविक विकास तब?

हेमलता त्रिपाठी

कल बाजार में शॉपिंग करते समय शालिनी मिल गई। मेरी पुरानी सहेली। इंटर में हम दोनों साथ पढ़े थे। फिर बिछुड़ गए। मुलाकात नहीं हुई। तकरीबन दस साल बाद मिली थी। हम दोनों के पास कहने सुनने को बहुत कुछ था। सो खरीदारी के बाद एक होटल में बैठ गए। बातों का सिलसिला चल पड़ा।

मैंने ही बात शुरू की, यह बताओ पति और बच्चों की क्या हाल है? यह सुनते ही शालिनी फूट फूट कर रोने लगी। काफी देर बाद जब वह् संयत हुई तो उसने बताया, हेमलता क्या हुआ कि मेरे  सारे फैसले गलत हो गए। ग्रेजुएशन के बाद जब मैं मेरठ नौकरी करने गई वहीं राजू से मेरी मुलाकात हुई। राजू को मैंने अपने साथ जीवन की राह पर चलने के योग्य पाया। कुछ दिन तो ठीक ठाक रहा पर बाद में राजू बुरी संगति में पड़ गया। फिर वह् मुझे रोज शराब पीकर मारने पीटने लगा। दो सालों तक तो मैं कैसे भी  सहन करती रही। आखिरकार रोज रोज की मारपीट से तंग आ गई। मेरे सब्र का बांध टूट गया। मैने राजू को हमेशा हमेशा के लिए त्याग दिया और नई जिंदगी की शुरुआत की। फिलहाल एक किराए के कमरे में रहती हूं। एक छोटी सी नौकरी पकड़ ली है। कैसे करके गुजारा चल जाता है।
आज इक्कीसवीं सदी में भी महिलाओं को सबसे बड़ी समस्या घरेलू हिंसा की झेलनी पड़ रही है, लेकिन आर्थिक कमजोरी की वजह से महिलाएं इसका सामना नही कर पाती। अगर शालिनी रुपए पैसे से मजबूत होती तो वह् राजू जैसे दरिंदे का साथ कभी का छोड़ देती। पर ऐसा था नहीं। इसलिए वह् पूरे दो साल तक उस नरक का सामना करती रही। उस राक्षस की मारपीट सहती रही।
आज हमारे देश मे शालिनी जैसी महिलाओं की संख्या लाखों से ज्यादा करोड़ो में है जिन्हें रोज घरेलू हिंसा का दंश झेलना पड़ता है। ऐसी महिलाओं या लड़कियों, जिनके साथ उनके भाई, पिता, चाचा आदि मारपीट करते हैं के सामने कोई दूसरा रास्ता भी नहीं होता। इनके साथ अपनाया जा रहा इस प्रकार का कठोर रवैया अत्यंत दुखद है। आप इनकी आपबीती सुन नहीं सकते। जब शालिनी राजू की अमानवीयता बता रही थी तो मेरी आंखें नम हो गई थी। इतना गुस्सा आ रहा था राजू के ऊपर कि अगर वह् सामने होता तो उसे मैं कच्चा चबा जाती।
क्या हम विकसित कहे जा सकते हैं? क्या यही विकास हुआ है हमारे समाज का? बिल्कुल नहीं। दरअसल, जो पुरुष वर्ग है वह् आधी आबादी पर अपना हुक्म चलाने में ही अपनी मर्दानगी समझता है। वह् महिलाओं को एक निश्चित दायरे में बांधकर उनकी कार्य शैली और गुणवत्ता, प्रतिभा और क्षमता को विकसित नही होने देना चाहता। असलियत में ऐसा करना पूरे देश के विकास को रोकने जैसा है। क्योंकि महिलाओं को आधी आबादी कहा जाता है और आधी आबादी को तकलीफ देने उनकी प्रतिभा को रोकने का सीधा मतलब देश का आधा विकास होना है।
सवाल यह उठता है कि इस घरेलू हिंसा को कैसे रोका जाए? कैसे इस पर विराम लगाया जाए? ताकि शालिनी जैसी महिलाओं की संख्या न बढ़े। हमारी सरकार को इसके लिए कोई अहम कदम उठाने चाहिए, जिससे हमारे देश की महिलाएं भी आगे बढ़ सकें और अपने जीवन यापन के लिए कुछ कर सकें जिनसे उनका तेजी से तथा बहुआयामी विकास हो। अहम कदम मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि इस बारे में कानून तो बहुत हैं पर उनका कड़ाई से पालन नहीं किया जाता। आप घरेलू हिंसा से होने वाली मौतों का आंकड़ा देख लीजिए।
आप घरेलू हिंसा वाले अदालती मामलों पर नजर डालिए, आपको सच्चाई पता चल जाएगी। आपको यह पता चलेगा कि पूरे देश हर साल कई हजार महिलाएं घरेलू हिंसा की भेंट चढ़ जाती हैं। मुकदमें अदालतों में सालों साल चलते रहते हैं। उनमें फैसला नहीं हो पाता। महिलाओं को बिना किसी डर के, खुल के जीवन जीना चाहिए, ये तब हो सकता हैं जब हमारी सरकार और कानून महिलाओं का कायदे से साथ दे।महिलाएं जब आत्मनिर्भर और पढ़ी लिखी होंगी, वे तब घरेलू हिंसा का सामना कर पाएंगी। इसके बाद ही समाज का वास्तविक विकास हुआ है ऐसा कहा जाएगा और तभी स्वस्थ समाज का निर्माण भी हो सकेगा।कितनी विसंगति है कि आज के दौर को हम विकासशील कहते हैं, जबकि परिवार के पहिये को कायदे से चलने ही नही दिया जाता। ऐसे में हम समाज और देश के विकास की कल्पना कैसे कर सकते हैं? हमें घर से लेकर बाहर तक महिलाओं को साथ लेकर चलना होगा, उन्हें बराबरी का दर्जा देना होगा। उन्हें डंडे से नहीं बल्कि गरिमा से बताना होगा। अन्यथा समाज का विकास भाषणों और सेमिनारों में ही नजर आएगा और कहीं नहीं।

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