चुनौती भरा पेशा है पत्रकारिता

हेमलता त्रिपाठी

मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी का एक शेर है, खींचो न कमानों से तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो अखबार निकालो। यानी कि छपे हुए शब्दों की ताकत सबसे बड़ी होती है। यह तीर कमान, तलवार तोप से ज्यादा मारक होता है। यह बात आज इक्कीसवीं सदी में भी सत्य है। अखबार निकालना यानी पत्रकारिता एक ऐसी कला है जिसे शब्द और चित्र के माध्यम से पेश किया जाता है। इसकी ताकत बहुत होती है और इसे आकार देनेवाला पत्रकार होता है। हालांकि ऊपर से देखने से यह एक आसान काम लगता है लेकिन यह उतना आसान नहीं होता है। पत्रकारिता कोई सरल पेशा नहीं है। पत्रकार पर कर्इ तरह के दबाव हो सकते हैं। अपनी पूरी स्वतंत्रता के बावजदू उस पर सामाजिक और नैतिक मूल्यो की जवाबदेही होती है।
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना गया है। इस हिसाब से न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका जैसे तीन स्तंभ को बांधे रखने के लिए पत्रकारिता एक कड़ी के रूप मे काम करती है। इस कारण पत्रकार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उसके सामने कर्इ चुनौतियाँ होती है और दबाव भी। सामाजिक सरोकारो को व्यवस्था की दहलीज तक पहुँचाने और प्रशासन की जनहितकारी नीतियो तथा योजनाओं को समाज के सबसे निचले तबके तक ले जाने के दायित्व का निर्वहन करना पत्रकार और पत्रकारिता का कार्य है। पर इस रास्ते मे कई बाधाएं भी होती हैं। एक पत्रकार को उन बाधाओं से निपटते हुए अपना काम करना होता है।
एक समय था जब भारत में कुछ लोग प्रतिष्ठित संस्था एवं व्यवस्था को समाज के विकास मे सहायक नहीं समझते थे। यह लोग अपने नए विचारो के प्रचार प्रसार के लिए पत्र-पत्रिकाओ का प्रकाशन करते थे। यह उनकी प्रगति तथा प्रवृत्ति को लोगो तक पहुंचाने का माध्यम बना था। तकनीकी विकास एवं उद्योग एवं वाणिज्य के प्रसार के कारण एक दिन यह एक कमाऊ व्यवसाय में परिवर्तित हो जाएगा, यह बात उन्होने सपनों में भी नहीं सोचा था। समाज के कल्याण, नए विचार के प्रचार प्रसार के लिए पत्रकारिता को समर्पित माना जाता था। तब पत्रकारिता को एक मिशन माना जाता था। इसमें नैतिकता को एक दर्जा प्राप्त था। पर उस समय यह किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह एक दिन प्रोफेशन मे बदल जाएगी और इसके लिए डिग्री, डिप्लोमा के पैमाने पर योग्यता एवं दक्षता मापी जाएगी। पर इस मापदण्ड को आप अपने समर्पण भाव से बदल सकते सकते हैं। मैं अपनी बात बताऊं। मेरे मन में कविता, पत्रकारिता और लेखन में करियर बनाने का सपना एक लम्बे समय से बसा हुआ था। पर हिम्मत करे इंसान तो क्या काम है मुश्किल। मुझे रास्ता मिला और मैं सन 2016 से मुंबई से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार “ विकलांग की पुकार” की रिपोर्टर तथा देश की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी ‘पत्रकारिता कोश’ के ‘लखनऊ सूचना ब्यूरो’ के रूप में काम करने लगी। फिलहाल इंडियन एक्सप्रेस चैनल, लखनऊ में एंकर हूं। वैसे मेरी कविताएं व विचार दोपहर का सामना, विकलांग की पुकार, कर्म कसौटी, हिन्द स्वाभिमान, नई पीढ़ी, प्रदेश विस्तार, शिखर सत्ता, अग्निशिला, जन सामना, चारभुजा टाइम्स, वृत्त मित्र, राष्ट्रीय अधिकार आदि पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं। इसी कविता, पत्रकारिता व लेखन की वजह से जो मुझे विशेष उपलब्धि मिली है राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन-वाजा इण्डिया की महाराष्ट्र इकाई की तरफ से मुझे मुंबई में 8 अक्टूबर 2017 को ‘काव्य गौरव सम्मान’-2017 तथा नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला में हिंदुस्तानी भाषा अकादमी के समीक्षा सम्मान-2018 से सम्मानित किया जा चुका है।
लोकतंत्र व्यवस्था मे पत्रकारिता भाव की अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक माध्यम के रूप में स्वीकृत है। इसलिए पत्रकारिता या मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।
आजादी के बाद लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत आगे बढ़ने के कारण समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, प्रसारण मे वृद्धि हुर्इ है। इसका सामाजिक सरोकार होने के बावजदू यह एक उद्योग के रूप मे परिवर्तित हाे चुका है। पत्रकारिता ने एक विकसित पेशे के रूप में शिक्षित युवाओं को आकर्षित किया है। अब तो इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। सोशल मीडिया और वेब पोर्टल ने पत्रकारिता का चेहरा ही बदल डाला है।
यह ध्यान रहे कि पत्रकारिता के लिए किताबी ज्ञान की तुलना में कुशल साधना की जरूरत अधिक होती है। दरअसल यह एक कला है। लिहाजा इसमें साधना के बल पर ही कुशलता हासिल की जा सकती है। किताब पढ़कर डिग्री तो हासिल की जा सकती है लेकिन कुशलता के लिए अनुभव की जरूरत होती है। इसके बावजूद चूंकि यह अब पेशे में बदल चुकी है इसलिए योग्यता का पैमाना विचारणीय है। उस प्राथमिक योग्यता एवं सामान्य ज्ञान के लिए इस विषय मे कुछ सामान्य नीति नियम जानना और समझना अत्यंत जरूरी है।
एक बात और कि अतीत में जितने भी पत्रकारो ने श्रेष्ठ पत्रकार के रूप मे ख्याति प्राप्त की है उन्होंने किसी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता विषय में कोर्इ डिग्री या डिप्लोमा हासिल नहीं किया है। वे अपने जुनून और प्रवृत्ति के आधार पर साधना के बल पर पत्रकारिता के क्षेत्र में शीर्ष मे पहुचे। कक्षाओं में कुछ व्याख्यान सुननकर या पाठ्यक्रम पढ़ने से पत्रकार के रूप में जीवन आरंभ करने के लिए यह सहायक हो सकता है। इसे एक पेशे के रूप मे अपनाने में क्या सुविधा, असुविधा है उस पर उन्हे मार्गदर्शन मिल सकता है। पत्रकारिता को नए करियर के रूप में अपनानेवाले युवाओ को पत्रकारों की जिम्मेदारी एव समस्या पर जानकारी हासिल हो सकती है। पर बाकी तो उन्हें स्वाध्याय से ही सीखना है।

(लेखिका इंडियन एक्सप्रेस चैनल, लखनऊ में एंकर हैं।)

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